अखिल भारतीय सहारण परिवार (इन्डिया)

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History Of Saharan Pariwar

 

ठाकुर देशराज लिखते हैं कि भाट-ग्रन्थों में राव सारन नाम के भाटी और औलाद में हुए लोगों का नाम सारन है। भाट लोग कहते हैं कि सारन ने जाटनी से शादी कर ली थी। इससे उनके वंशज सार कहलाए, यह कथा नितान्त झूठी गढन्त है, जिनका हमने पिछले पृष्ठों में काफी खंडन कर दिया है। सारन वंशीय जाट-क्षत्रिय हैं। सारन व उनके पूर्वज जाट थे। वे उस समय से जाट थे, जिस समय कि लोग यह भी नहीं जानते थे कि राजपूत भी कोई जाति है। जांगल-प्रदेश में उनके अधिकार में 300 से ऊपर नगर और गांव थे। रामरत्न चारण ने उनके अधिकृत गांवों की संख्या 460 बताई है। उनकी राजधानी भाडंग में थी।  खेजड़ा, फोगा, बूचावास, सूई, बदनु और सिरसला उनके अधिकृत प्रदेश के प्रसिद्ध नगर थे। राठौरों से उनके जिस राजा का युद्ध हुआ था, उसका नाम पूलाजी था। प्रजा इनकी धन-धान्य से पूरित थी। राज्य में पैदा होने वाली किसी चीज पर टैक्स न था। वहां जो चीजें आती थीं, उन पर भी कोई महसूल न था। कहा जाता है कि जांगल-देश के ब्राह्मण घी, ऊन का व्यापार किया करते थे। राज्य में जितनी भी जातियों के प्रजा-जन थे, सबके साथ समानता का व्यवहार किया जाता था। सारन शांति-प्रिय थे। उनकी प्रवृत्ति थी, ‘स्वंय जियो और दूसरों को जीने दो’। रामरत्न चारण ने अपने लिखे इतिहास में बताया है कि गोदारों जाटों का सरदार पांडु सारणों के अधीश्वर की स्त्री को भगा ले गया, इस कारण जांगल-प्रदेश के सभी जाट-राज्य गोदारों के विरुद्ध हो गए। कहना होगा कि जाटों के लगभग तीन हजार गांवों की सल्तनत को कुल्हाड़ी के बेंट गोदारा पांडु ने नष्ट करा दिया। पांडु यदि राठौरों के हाथ अपनी स्वाधीनता को न बेच देता, तो राठौरों पर इतनी आपत्ति आती कि फिर बेचारे जांगल-प्रदेश की ओर आने की हिम्मत तक न करते। गोदारों की शक्ति अन्य समस्त जाट-राज्यों की शक्ति के बराबर थी। यह नहीं कहा जा सकता कि जांगल-प्रदेश के जाटों को राठौरों ने जीता। जाटों के सर्वनाश का कारण उनकी पारस्पारिक फूट थी। उसी फूट का शिकार सारन जाट हो गए। उनका प्रदेश युद्धों के समय उजाड़ दिया गया और वे पराजित कर दिए गये, किन्तु शांति-प्रिय सारनों ने जो वीरता अपने राज्य की रक्षा के लिए दिखाई थी, वृद्ध सारन जाट उसे बड़े गर्व के साथ अपनी सन्तान को सुनाता है।

भाड़ंग चुरू जिले की तारानगर तहसील में चुरू से लगभग 40 मील उत्तर में बसा था. पृथ्वीराज चौहान के बाद अर्थार्त चौहान शक्ति के पतन के बाद भाड़ंग पर किसी समय जाटों का आधिपत्य स्थापित हो गया था. जो 16 वीं शताब्दी में राठोडों के इस भू-भाग में आने तक बना रहा. पहले यहाँ सोहुआ जाटों का अधिकार था और बाद में सारण जाटों ने छीन लिया. जब 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में राठोड इस एरिया में आए, उस समय पूला सारण यहाँ का शासक था और उसके अधीन 360 गाँव थे. इसी ने अपने नाम पर पूलासर (तहसील सरदारशहर) बसाया था जिसे बाद में सारण जाटों के पुरोहित पारीक ब्राह्मणों को दे दिया गया. पूला की पत्नी का नाम मलकी था, जिसको लेकर बाद में गोदारा व सारणों के बीच युद्ध हुआ  मलकी के नाम पर ही बीकानेर जिले की लूणकरणसर तहसील में मलकीसर गाँव बसाया गया था. सारणों में जबरा सारण और जोखा सारण बड़े बहादुर थे. उनकी कई सौ घोड़ों पर जीन पड़ती थी. उन्हीं के नाम पर जबरासर और जोखासर गाँव अब भी आबाद हैं, मन्धरापुरा में मित्रता के बहाने राठोडों द्वारा उन्हें बुलाकर भोज दिया गया और उस स्थान पर बैठाने गए जहाँ पर जमीन में पहले से बारूद दबा रखी थी. उनके बैठ जाने पर बारूद आग लगवा कर उन्हें उड़ा दिया गया.

उदाराम सहारण ने भाट अभिलेखों के आधार पर सहारण जाति का इतिहास निम्नानुसार बताया है:

सहारण गोत्र की प्रसिद्धि संवत 1122 (सन 1065 ई.) हुई जब राजा सारण द्वारा पुराना नाम वरबुड़ियावास था, सहारनपुर के नाम राज्य की स्थापना वर्ष संवत 1122 (1065 ई.) में हुई।

सहारण वंश वृक्ष इस प्रकार बताया है - राजा बलि - राजा सहारण - (पौंडर व) जसरा - पिथरा - मंगलसी - राजा मंगलसी भाडंग में संवत 1320 चेत बदि 5 (सन 1263) में थे जिनके पुत्र - (जालय व) लूनकरण - सोनगरा- देदा- बीरू- उदा -कालू - देवराज- जास्सा. जास्सा जी ने जास्सासर संवत 1421 (1364 ई.)

जासा के सात पुत्र थे सहसरों, मालक, भेरू, पानी, खानी, गोपी एवं बुद्धा.
बुद्धा जी के पुत्र दलावर -रिड़मल- फ़त्ता- लिखमा- (र्मद व) बीरू - (जसपाल व) दल्लू जी.
दलूजी के 3 पुत्र महरा, मूणा, डूंगर.
डूंगर जी संवत 1845 (सन 1788 ई.) सरदारशहर में बसे. डूंगर जी के पुत्र चेतन जी व जोरू जी, जोरू जी के चार पुत्र सेहो जी, हेमोजी, बीजो जी, टीकू जी.
हेमोजी के पुत्र- पुरुखो जी एवं जेसोजी थे.
पुरुखो जी संवत 1919 (सन 1862 ई.) में मिर्जावाली बस गये, जिनके तीन पुत्र नारायण जी, भादर जी, उदाराम सहारण हैं.

सहारनपुर- इसका नाम पहले बुडिया था. बलि के पुत्र सहारण के नाम पर सहारनपुर हो गया. राजा सारण द्वारा पुराना नाम वरबुड़ियावास था, सहारनपुर के नाम राज्य की स्थापना वर्ष संवत 1122 (1065 ई.) में हुई।
भाडंग -भाडंग नाम का प्रसिद्ध गांव आज भी तारानगर तहसील जिला चुरु में है. संवत 1320 (1263 ई.) में सारण राजा के वंशजों द्वारा भाड़ंग को राजधानी बनाया गया था।
सहारनपुर से राजा मंगलसी सहारण भाडंग पहुंचा. भाडंग उस समय का प्रसिद्ध ठिकाना था जहां जाटों के सहू, सिहाग, जोईया, झोरड़ गोत्र रहते थे. मंगलसी ने उन सबको वहां से निकाल दिया व उस पर संवत 1320 चेत बदि 5 (सन 1263 ई.) में कब्जा कर लिया.
जसासर - यह चुरु तहसील और सरदारशहर तहसील की सीमा के पास चुरु तहसील में आज भी गांव है, जिसको जस्सा सहारण ने संवत 1421 (सन 1364 ई.) में बसाया था.
इस प्रकार सहारण गोत्र का 27 पीढियों का 883 वर्षों का इतिहास उपलब्ध है. पुराने समय में राजस्थान में सहारणों के 360 खेड़े (गांव) की गणना की जाती थी. सहारनपुर के पास 444 गांव सलावा अब तक भौमसिंह पुत्र विजयसिंह राव गांव भड़सिया जिला नागौर की दातारगी में हैं.
पूलासर व राजा पूला सहारण- संवत 1400 (सन 1343 ई.) (तुगलक वंश 1320-1414)
सहारण वंश में संवत 1400 (सन 1343 ई.) में राजा पूला सहारण पूलासर के राजा हुये. पूलासर सरदारशहर से करीब 20 किमी दक्षिण पूर्व में चुरु की तरफ़ एक बड़ा गांव है जहां बोहरा व पांडिया ब्राहमण हैं. पूलासर व राजा पूला के दिल्ली बादशाह की बेगम को जमुना में डूबने से बचाने के बदले दिल्ली का शासन 3-1/2 दिन पूला राजा को देने की कहानी पूलासर के पांडिया ब्राहमण प्रमुख श्री बदरीप्रसाद पांडिया ने लेखक (उदाराम सहारण) को बड़े गर्व के साथ सुनाई. बादशाह ने 2 दिन के पूला के दिल्ली का राज करने के बाद शेष 1 दिन का राज्य चतुराई से बेगम के माध्यम से वापस ले लिया. तब पूला राजा के मंत्री पांडिया ने पूला राजा को कहा कि मुझे क्या दोगे. पूला राजा ने पूलासर ठिकाना इस पर पांडिया ब्राहमणों को दान दे दिया और कहा कि आज के बाद पूलासर में कोई भी सहारण नहीं रहेगा और न ही यहां का पानी पियेगा. इस परम्परा का पालन आज भी जारी है. पूलासर में कोई भी सहारण परिवार नहीं है.
राव भौमसिंह द्वारा भी कहानी तो लगभग यही बताई कि इक्षुराजा के नाम 2-1/2 दिन दिल्ली का शसन किया. 1 दिन वापस दान कर दिया.
पांडिया ब्राहमण आज भी पूलासर व पूला राजा के नाम पर फ़क्र करते हैं व बताते हैं कि पूलासर के पास पूलाना तालाब पर आज भी पूला राजा की समाधी के अवशेष हैं.

राव बीका और राव जोधा ने जाटों को समूल नष्ट करने की चाल चली। उन्होंने राजपूतों को मन्त्र दिया कि हम जाटों से लड़कर नहीं जीत सकते इसलिए धर्मभाई का रिवाज अपनाकर जब विश्वास कायम हो जाये तब सामूहिक भोज के नाम पर बाड़े में इकठ्ठा करो। नीचे बारूद बिछाकर नष्ट करो। इस कुकृत्य से असंख्य जाटों को नष्ट किया गया। बीकानेर रियासत के मुख्य गाँव जहाँ जाटों को जलाया गया -

We find mention of name Saran in Indian Epics at various places. It is a matter of research if there is any connection of these with the present Saran clan.
Saran in Ramayana
Yuddha Kanda/Sarga 26 in Ramayana mentions about Saran, the spy of Ravana. On hearing the submission of Sarana, Ravana climbs up the roof of his palace and sees the entire army of vanaras from there. Ravana enquires about the various vanara leaders and Sarana shows him Nila, Angada, Nala, Sweta, Kumuda, Rambha, Sarabha, Panasa, Vinata and Kr athanathe army-generals along with their distinguishing characteristics. Sarana along with Shuka find mention in Ramayana Yuddha Kanda Sarga 26-29.

Saran in Mahabharata
Adi Parva Mahabharata Book 1 Chapter 211 in Subhadra-harana Parva mentions a grand festival of the Vrishnis and the Andhakas on Raivataka mountain. Sarana along with Gada, Vabhru, Nisatha, Charudeshna etc is mentioned in shloka 10 who accompanied by their wives adorned that mountain-festival. In this festival Subhadra is introduced as uterine sister of Saran.
Mahabharata (I.211.10) Adi Parva, Mahabharata/Mahabharata Book I Chapter 188 gives list of Kshatriyas who came on Swayamvara of Draupadi. Shloka 16 here mentions Saran: Mahabharata (I.177.16), (1.188), Sabha Parva, Mahabharata/Book II Chapter 31 gives the Kshatriyas brought tributes on Rajasuya sacrifice of Yudhisthira. This list in shloka 5 mentions about Saran king along with Aniruddha, Vabhru, Gada, Pradyumna, Samba, Charudeshna. Mahabharata (II.31.5) Vana Parva, Mahabharata/Book III Chapter 267 shloka 52 mentions about Saran as counsellor and officer of Ravana along with Shuka, who came as spies while Rama along with Vanaras were planning to cross the ocean and arrive at Lanka.


In Bhagawata Purana
Sarana ancestry : A study of the Bhagavata Purana; or, Esoteric Hinduism' by Purnendu Narayana Sinha, pp 223 mentions that Vasudeva had several wives. Sarana was brother of Baladeva born from Rohinithe wife of Vasudeva.



ADDRESS
Dr. D.V. Saharan
(Retd. Director, Health Services, Haryana) President AISP,   543-D,
Pace City-II , Sec.- 37,
Gurgaon.(Haryana)

CONTACTS
Email: info@saharanpariwar.com
Mob No: 9810009877

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